
मंदिर का इतिहास
आसण खास मां हिगलाज मातेश्वरी मंदिर का इतिहास
नाथ सम्प्रदाय के रावल पंथ गुरू शिश्य परम्परा का आसण खास मां हिगंलाज मातेश्वरी मंदिर
ग्यारहवी सदी का सिद्ध गेहला रावल जी की तपोस्थली एक पहर साक्षात हिगंलाज माता का
निवास का प्राचीनतम नागफणी पहाडी पर स्थित स्थान है जो कि सम्पूर्ण भारतवर्श का सबसे
प्राचीन हिगंलाज माता का एक पहर साक्षात निवास वाला एक मात्र आदि शक्तिपीठ मंदिर है
यहां पर गेहला रावल द्वारा कई चमत्कार किये गये है जिसमें पुरी सेना को एक छोटे से
कमण्डल से जल पिलाना एवं अपने धुणे से कई नो लखा चादर निकालना एवं स्वयं की
पेशाब की धार से 52000 बीघा भूमि का ताम्र पत्र दिया जाना शामिल है इस स्थान पर सिद्ध
गेहला रावल जी का जाग्रत धुणा, पशुपति नाथ एकलिंग महादेव जी, भैरव मंदिर, जीवित
सिद्धो की समाधियां, शनि मंदिर, गेेलेश्वर सरोवर, प्राचीन बावडी, चामुण्डा माता मंदिर,
सोमरावल जी का स्थान सहित मंदिर का मुख्य भामोलाव डामर सडक से पहाडी तक सडक
निर्माण, संत निवास, अन्नपूर्णा प्रसादी भण्डार, गौशाला, धर्मशाला, यात्री निवास, शंनि मंदिर,
सिद्धो की बावडी, सिद्धो की समाधियां कई दर्शनीय स्थल विधमान है उक्त आसण रावल पंथ
की गुरू शिश्य परम्परा का अन्तिम मुख्य (सिर मत्था) स्थान है जिसमें सन् 1940 से 1957 के
समय में लहरी नाथ जी जो 12 वर्श तक लगातार खडे रहकर कठोर साधना कर खडियां बाबा
के नाम से प्रसिद्ध रहे है कालान्तर में खडियां बाबा द्वारा माउण्ट आबू चीपा बेरी, बरलूट एवं
आम्बेश्वर गोरक्षनाथ आश्रम में अपनी तपस्या की गई थी खडियां बाबा के शिश्य वर्तमान आयस
पीर शम्भूनाथ जी रावल 85 वी पीढी मे ं आसीन होकर वर्श 2011 से विभिन्न धार्मिक, निर्माण
सहित कई कार्य संचालित किये जाकर जीवंत ईतिहास का निर्माण कर दिया गया है जो
वैभवशाली ईतिहास समय के फेर में जीर्णशीर्ण होकर लुप्त होने की कगार पर आ चुका था
एवं जिस स्थान को आसपास के ग्रामवासी तक यादो से लुप्त करने की कगार पर था उस
स्थान को वर्तमान पीर जी द्वारा अपने आप को मां भगवती की सेवा में लगाकर मां के
अर्शिवाद एवं गेहला रावल जी की प्रेरणा से कठिन कार्य कर स्वर्गतुल्य देवभूमि बना कर सजा
दिया गया है।
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